*संस्कृति का अंतर*
*संस्कृति का अंतर*
*_अपने मृत सैनिकों को भी भूल जाने वाले चीन और पाकिस्तान हैं एक और दूसरी और अपने पशुओं, नदी, पर्वत, वन की पूजा करने वाला भारत जो शुरू में गप्प लगता है, गंवार लगता है, वह संस्कृति के रूप में अद्भुत फल देता है ।_*
_कुछ उदाहरण:_
*आंग्ल-अफगान युद्ध बहुत लंबा चला था। करीब 1700 भारतीय जवान और ब्रिटिश अफसर इसमें हताहत हुए थे। एक बार किसी मोर्चे पर ब्रिटिश इंडियन फौज की लगातार हार हो रही थी। उस मोर्चे पर गढ़वाल राइफल्स को भेजा गया।*
*_गढ़वाल राइफल्स के जवान जाने कैसे रास्ता भटक गए और किसी और ही दिशा में चल पड़े। हालत यह हुई कि सारा खाना खत्म, और भूखों मरने की नौबत ? तभी फौजियों ने देखा कि ऊपर टीले से एक बकरा आ रहा है। फौजी खुश। चलो, एक बकरा तो मिला। इसी को भून-पका कर पेट की आग शांत की जाए। बकरा नीचे उन्हीं की तरफ आ रहा था तो फौजी उसके और नजदीक आने का इंतजार करने लगे।_*
*तभी वह बकरा एक जगह रुक कर अपने खुरों और थूथन से जमीन खोदने लगा। फौजियों ने देखा कि जमीन से आलू निकल रहे हैं। बकरे की देखा देखी उन्होंने भी जमीन की खुदाई की। आलू ही आलू निकलने लगे । दरअसल वह आलू का ही खेत था। फौजियों के आने-जाने से जमीन के ऊपर निकले पौधे कुचल कर गायब हो चुके थे। इन आलुओं ने सारे फौजियों की जान बचा ली।*
*_जवानों ने उस बकरे का शुक्रिया अदा किया और फैसला किया कि युद्ध खत्म होने पर इस बकरे को लैंसडाउन ले जाएंगे। वे उसे लैंसडाउन ले भी आए। उसे जनरल की रैंक दी गई। फौजी बैरकों के बगल में उस बकरे के लिए एक कमरा रिज़र्व किया गया। तमाम सुख-सुविधाएं मुहैया कराई गई। बकरे को आजादी थी कि वह कहीं भी, कुछ भी खा सकता था। अफसरों के बगीचे के फूल तो सामान्य बात थे। कैंटोनमेंट के बाहर नागरिक बाजार में भी वह बाजार में बिक रही कोई भी चीज पेट भरकर खा सकता था। किसी की हिम्मत नहीं कि उसे दुत्कार दे। दुकानदार बकरे द्वारा खा लिए गए सामान का हिसाब बता देते, कैंटोनमेंट उनका भुगतान कर देता।_*
*अपनी मृत्यु तक बकरे ने आलीशान जीवन जिया। गढ़वाल राइफल्स, लैंसडाउन, उत्तराखण्ड में आज भी उस बकरे का स्टैचू लगा है ।*
_घटना 2_
*_माल ढुलाई के साधन जैसे कि ट्रेन या ट्रक उन जगहों पर तो नहीं जा सकते जहाँ रेल लाइन या सड़क हो ही ना । तो ऐसी जगहों पर ढुलाई का एकमात्र साधन खच्चर होते हैं।_*
*भारत देश की दुर्गम पहाड़ी सीमाओं पर हथियार, भोजन, पानी इत्यादि सामानों की ढुलाई में खच्चरों की सेवा ली जाती है। सेना में सर्विस देने वाले प्रत्येक जीव को सिर्फ जानवर नहीं माना जाता। उन्हें भी वही सम्मान मिलता है जो किसी दोपाये जानवर, अर्थात मनुष्य (सैनिक) को मिलता है।*
*_1971 के भारत-पाक युद्ध में एक एनिमल ट्रांसपोर्ट कॉन्वॉय, जो माल ढुलाई कर रहा था, पर अचानक ही पाकिस्तानियों ने हमला कर दिया। खच्चरों के ड्राइवरों ने जल्दी से कवर लिया और कुछ ही देर में भारतीय सैनिकों ने जवाबी फायरिंग की। कुछ समय बाद जब शांति हुई तो पता चला कि तीन खच्चर मिसिंग है।_*
*यह सामान्य बात थी। भारत हो या पाकिस्तान, जब भी जिसे मौका मिलता, वो दुश्मन के खच्चरों को किडनैप कर लेता। तीन खच्चर अब पाकिस्तानी आर्मी की सेवा में खपा लिए गए।*
*_लेकिन अगले दिन भारतीय फौजियों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन तीन में से एक खच्चर ने अगले ही दिन अपनी यूनिट में रिपोर्ट किया। वह अकेले खाली हाथ (खाली पीठ) नहीं आई थी, बल्कि एक पाकिस्तानी एमएमजी और दो बक्से भर कर गोलियां भी लेती आई थी।ś*
*उस खच्चर की यह वीरता देख उसे वीर चक्र से नवाजा गया। वीर चक्र मिलने पर फिर कभी उसे माल ढुलाई के काम में नहीं लगाया गया। अपनी मृत्यु तक, अगले सात साल तक वह मस्त खाना खाती, अपनी यूनिट में घूमती-टहलती रहती।*
*_आर्मी सर्विस कोर, बैंगलोर में उस खच्चर की फ़ोटो और उसे मिला वीर चक्र आज भी ससम्मान रखा गया है। उस खच्चर का नाम था, "पेडोंगी"।_*
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Nice ☝️
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